Motivational Story For Students
बात तब की है जब भारत में गुरुकुल हुआ करते थे। ऐसे ही एक गुरुकुल में पढ़ता था एक मूर्ख, बल्कि महामूर्ख बालक। वह कक्षा में आता तो था लेकिन उसका दिमाग कहीं बाहर ही रहता था। कक्षा की गतिविधियों में ना तो उसको कोई दिलचस्पी थी और ना ही उसे कुछ समझ में आता था। उसकी बेवकूफी और मूर्खता पर कक्षा के अन्य विद्यार्थी भी उसका मजाक बना दिया करते थे। उस बच्चे को वरधराज (बैलों का राजा) के नाम से सभी बच्चे चिढ़ाया करते थे जोकि उसके असली नाम ‘वरदराज’ का बिगड़ा हुआ रूप था। अब उसकी मूर्खता ही इतनी मासूमियत भरी होती थी की अध्यापक भी करे तो क्या करे।
एक ऐसा ही किस्सा मुझे याद आ रहा है।
हिंदी में एक लफ्ज़ होता है ‘कंठस्थ करना’। कंठ का मतलब होता है ‘गला’ और अस्त का मतलब होता है ‘समां लेना’ । इस तरह कंठस्थ का मतलब हुआ गले में समां लेना, आसान शब्दों में कहें तो याद कर लेना या रट लेना। अब आते हैं घटना के ऊपर। गुरुकुल में छुट्टियां पड़ने वाली थी गुरु जी ने सभी बच्चों को एक किताब की ओर इशारा करते हुए कहा कि जब हमारा गुरुकुल खुलेगा तो सभी बच्चे इस पुस्तक को कंठस्थ करके लाएंगे। जब छुट्टियों की अवधि पूरी हो गई और गुरुकुल खुल गया तब जो बच्चे पढ़ने में तेज थे बुद्धिमान थे वह भी पूरी पुस्तक को कंठस्थ नहीं कर पाए थे और पूरी कक्षा में डर का माहौल था (क्योंकि कोई भी पूरी तरह से कंठस्थ नहीं कर पाया)। लेकिन वरदराज ! वरदराज तो उस दिन सबसे आगे बैठा था जैसे उसके चेहरे पर कोई खौफ ही नहीं था , लग रहा था कि वह सब कुछ कंठस्थ कर कर आया है। कक्षा प्रारंभ हुई गुरु जी ने प्रश्न किया कि कौन-कौन कंठस्थ करके आया है। किसी की हिम्मत नहीं थी खड़े होने की लेकिन वरदराज खड़ा हो गया। गुरुजी समेत पूरी कक्षा को हैरानी थी। गुरुजी ने पूछा क्या तुमने पूरी पुस्तक कंठस्थ कर ली वरदराज? उत्तर दिया जी गुरु जी। गुरुजी बोले दिखाओ क्या कंठस्थ करके आए हो। वरदराज गर्दन को आसमान की ओर उठाकर खड़ा हो गया। गुरुजी बोले सिर्फ खड़े ही नहीं होना, जो कंठस्थ करके आए हो उसे दोहराना भी है। वरादराज अब भी आसमान की ओर गर्दन उठाकर खड़ा रहा। कठोरता पूर्वक पूछे जाने के बाद वरादराज ने अपने कंठ (गले) के ऊपर लगी राख की ओर इशारा करते हुए कहा कि मैंने पुस्तक को जलाकर उसकी अस्थियां (राख) अपने गले (कंठ) पर लगालीं, इस प्रकार मैंने पूरी पुस्तक को कंठस्थ कर लिया ।
इसके बाद कक्षा में जो शोर का सिलसिला शुरू हुआ वह गुरु जी के क्रोध पर आकर रुका। दंड स्वरूप वरदराज को गुरुकुल से निष्कासित कर दिया गया। वरादराज इतना ज्यादा निराश हुआ कि वह घर गया और जेब में कुछ बैर रख कर आत्महत्या करने घर से निकल गया। चलते चलते एक एक बैर मुंह में डालता गया और आखिर में वह बैर भी खत्म हो गए। रास्ते में उसे प्यास लगी तो एक कुआं देखा जिसके पास एक आदमी पानी पी रहा था। वरादराज ने कहा कि आप मेरे लिए भी पानी निकाल दीजिए, व्यक्ति ने मना कर दिया तथा स्वयं निकालने को कहा। जब वह रस्सी खींच रहा था तब उसने देखा कि रस्सी की रगड़ से पत्थर पर निशान पड़ गए हैं। बालक वरदराज ने इसका कारण पूछा तब उस व्यक्ति ने बताया कि बार-बार रस्सी द्वारा पत्थर पर रगड़ लगने से पत्थर पर निशान बन गए हैं। वरदराज की बुद्धि तुरंत घूमी उसने पूछा कि अगर मैं भी बार-बार पाठ का अभ्यास करता रहूंगा तो क्या मैं भी मंद बुद्धि से बुद्धि शाली बन जाऊंगा ? सामने खड़े व्यक्ति ने उत्तर दिया हां, बिल्कुल प्रयास करते रहने से सब संभव हो जाता है।
बस अब वरदराज को जीवन का नया मोड़ मिल गया और वह उत्साहित होकर वापस घर की ओर चला गया और स्वाध्याय करता रहा। उसने स्वाध्याय से इतना ज्ञान अर्जित कर लिया था कि कहा जाता है घर बदलते समय उसने दो बैल गाड़ियों पर अपनी पुस्तकें लादी थीं।
आगे चलकर वह संस्कृत का एक महान विद्वान बना और भारतवर्ष में वरदराज के नाम से विख्यात हुआ
उन्होंने ही कहा था
“करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निसान।।”
(जिस प्रकार बार-बार रस्सी के खींचे जाने से पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है उसी तरह बार-बार अभ्यास करने से मंद बुद्धि भी बुद्धिमान बन जाता है)
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